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Wednesday, September 12, 2018

राजनीतिकरण


देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है.
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है...

चुनाव मे सैकड़ों वादे करतें हैं.
और फिर उन्ही के राज मे बच्चे भूख से मरते हैं...
जबकि देश के अनाज गोदमो मे सड़ते...
और कुछ धन्ना सेठ अपनी तिज़ोरी भारतें हैं...
पता नही हमे कैसे ये सब सहन हो गया है...
देश मे रोटी का भी विमुद्रीकरण हो गया है...?

देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है...
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है...

देश के लिए जो सैनिक मरते हैं.
उनके परिवारजन सरकारी अनुकंपा को तरसते हैं.
हर रोज़ सभी से गुहार करते हैं.
लेकिन सरकारी तन्त्र अपनी मनमानी करते है.
वीरो के सम्मान का भी हनन हो गया है,
सरकारी व्यवस्था मे कैसा अनियंत्रण हो गया है…?

देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है...
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है...

जिस देश मे देवी की पूजा और सम्मान करते हैं.
वहीं लोग महिलाओं का नीचा मान करते हैं.
शायद उनकी तरक्की देख जलते हैं. 
इसी वजह से मन मे इतना भेद रखते हैं...
ना जाने क्यूँ लोगो का इतना मैला मन हो गया है...
मानो मानवता का भी चीरहरण हो गया है...

देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है...
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है...


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